Wednesday, January 21, 2015

सरकार स्वावलंम्बि बने

मेरे बिचार से,सरकार का मतलब है,अपने नागरिकों को एक स्वस्थ,अभिवावक का हक अदा करना,घर में दो तरह के मालिक देखे जाते हैं
एक तो वे ,जो अपने कुछ नहीं करते,बल्कि अपने मालिकाना हक का उपयोग करके अपने सदस्यों को ,ज्यादा से ज्यादा काम करने,और,घरेलु खर्च या विकास के नाम पर,पैसा जमा करने को कहते है,ऐसे मालिक अपने सदस्यों को ,कम से कम सुविधा लेने,मितव्ययि होने,की सलाह देते हैं,विपरित इसके कि वे खुद ज्यादा खर्चेलू और आराम तलब होते हैं,ऐसे मुखिया का परिवार ज्यादा दिन नहीं चलता,जल्द ही बिछड़ जाता है,बिखर जाता है,ऐसे मुखिया घर में पारिवारिक कलह को जन्म देते हैं ।
दुसरे वे जो खुद समर्थ होते हैं,ज्यादा से ज्यादा काम  करते हैं,अपने आचरण से अपने सदस्यों को जागरुक एवं कर्मठ बने रहने की सलाह देते हैं,जहॉ कहीं भी उसके सदस्य लड़खड़ाते हैं,वे उसका सहारा बनते हैं,ऐसे मुखिया का परिवार संयुक्त रहता है तथा उस परिवार का नाम और दबदबा समाज में बना रहता है।
अब इन उदाहरणों से आप भलिभॉति समझ गये होंगे कि मैं अपनी सरकार को किस श्रेणी में रखने वाला हूॅ।आप ठीक समझ रहे हैं हमारी सरकार पहले प्रकार की ही है,
कम से कम काम करना,अपनी कमाई धमायी कुछ नहीं,ज्यादा से ज्यादा सुख सुविधा उठाना,गाढ़ी मेहनत की कमाई को ईधर उधर खर्च करना,जरुरत के कामों पर खर्च की आवश्यकता पड़ने पर ,अर्थाभाव का रोना ,रोना !!
ऐसा कब तक चलेगा,आप जो भी पैसा कमाते हैं उसपर आयकर देते हैं कि नही?उसके बाद अपने बचे पैसे को लेकर जब बाजार में जाते हैं,तब ?कितने तरह के टैक्सों से पाला पड़ता हैं ?
ये सब क्या है,लूट और रंगदारी से अलग मुझे कुछ समझ में नहीं आता है।
आपके खर्चे शाही हैं,आवश्यकतायें ज्यादा हैं तो उसके लिये हमें बलि का बकरा क्यों बना रहे हो भाई ?
ज्यादा तो अच्छा यह रहता कि अपना कुछ उत्पादन करते,अपनी कमाई को एक नम्बर की कमाई बनाते,
आश्चर्य होता है कि एक भी पार्टी अथवा नेता सरकार को स्वावलंबि बनाने के बारे नहीं सोचता।
नागरिक बेबस है,लादे गये टैक्सों को भरने के लिये ।
क्या अंतर रह गया है,जमीन्दारी प्रथा,और आज की व्यवस्था में,
जन जन की पहली मॉग होनी चाहिये
सरकार अपना बोझ उठाने के लिये,अपना खुद का इन्तजाम करें,काली कमाई ,काला धन,भ्रष्टाचार खुद समाप्त हो जायेगा ।

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