Tuesday, January 27, 2015

शिष्टाचार की चेतना

"शिष्टाचार की चेतना"
जिस चेतना के विषय में मैं आपसे कुछ कहने जा रहा हूॅ वह कोई नयी बात नहीं है।इस विषय पर समय-समय पर व्यापक बहस होती रहती है,लेकिन इसका प्रभाव श्मशान के प्रभाव की तरह,क्षणीक होता है।
श्मशान का प्रभाव वहॉ जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर बैराग भाव उत्पन्न करता है"क्या रक्खा है,इस दुनिया में,सब छोड़ जाना है"लेकिन  थोड़ी ही देर बाद यह भाव समाप्त हो जाता है।
मैं शिष्टाचार के चेतना की बात कर रहा था,ऐसा इसलिये कि  इसके अभाव के चलते ही विभिन्न बुराईयों का जन्म होता है ।
शिष्टाचार की चेतना की, अगर सबसे बड़ी आवश्यकता है तो वह है,हमारे राजनेताओं को।
एक ओर ,जहॉ इन्हें अपने आचरण से समाज का मार्गदर्शन करना चाहिये था,वहीं पर ये अपने अशिष्ट व्यवहारों से  समाज को पथभ्रष्ट करने का काम कर रहे हैं।
संसद में,विधान सभा में,राज्य सभा में,अथवा जन सभा में,हर जगह शिष्टाचार का अभाव  हो गया है
एक दुसरे परआरोप प्रत्यारोप ही धर्म हो गया है,कोई किसी की बात को शान्ती से सुनने को तैयार ही नहीं है।
ऐसे में अगर मैं शिष्टाचार की चेतना जगाने की बात कर रहा हूॅ  तो क्या गलत है, फुटबाल के मैच मे फाऊल करने वाले को,रैफरी की बात न मानने वाले को मैच से बाहर कर दिया जाता है,उसी प्रकार ,शिष्टाचार तोड़ने वाले व्यक्ति का तिरस्कार किया जाना चाहिये,
शिष्टाचार की चेतना जागृत करने के लिये कठोर नियम बनाना अतिआवश्यक है।

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