वैसे तो मुझे अघोर पंथ की ज्यादा जानकारी नहीं है,इसलिये अगर कुछ गलत कहा जाय तो इसे विवाद का बिषय न बनाया जाय।
जहॉ तक मेरी मोटी समझ में यह बात आती है ,उसके अनुसार,एक यही पथ ऐसा है जो ईश्वर के द्वारा प्रदत्त हर वस्तु को उसके प्रसाद स्वरुप ग्रहण करता है,उसमें उसकी आस्था चरम पर होती है।
जब मैं बनारस में था तब एक दो बार "भगवान राम"के आश्रम पर जाने का ।उनके सतसंग में बैठने का मौका मीला था।
मैं वर्तमान में सरकारी सेवा से निवृत होने के बाद,वास्तु सलाहकार का काम कर रहा हूॅ,ऐसे कार्य के चलते मुझे विभिन्न प्रकार केघरों में जाने,उनके रहन सहन,पूजा स्थल को देखने का अवसर मीलता है।
प्राय: प्रत्येक घर में पूजा स्थल,धार्मीक चित्र देखने को मीलता है,अगर नहीं मीलता तो सम्मानित पूजा स्थल,चित्रों के प्रति सम्मान।
मेरा मानना है कि,किसी बड़े को अपने घर पर आमंत्रीत करने से बचना चाहिये,और अगर आमंत्रीत करते हैं तो उनका पूरा सम्मान किया जाना चाहिये।
पूजा पाठ अच्छी बात है,इसे सब समझते हैं,लेकिन उसमें सबसे बड़ी बात आस्था के साथ को लोग भूल जाते हैं,अगर आप महसूस करते हैं कि आप एकाग्र मन से पूजा नहीं कर पा रहे हैं तो उसे बन्द कर दें।
तब अब अपने मन में टटोलिये,किसमें आपकी आसक्ति ज्यादा है,अपनी उस आसक्त वस्तु,व्यक्ति,को ही मानसिक रुप से ईश्वर मानना शुरु कर दें,ईश्वर की नजदीकी मीलने लगेगी,ईश्वर के चित्र को जिस दिन से आप ईश्वर समझना शुरु कर देंगें,स्वत: ही आपकी अन्तरात्मा आपको निर्देशित करेगी कि पूजा स्थल में ,एक पर एक चढ़ाकर रक्खे गये फोटो,घर में जहॉ जी में आया लगाये गये चित्र ,ईश्वर को कष्ट दे रहे हैं
ईश्वर कण कण में है,इसलिये कोई वस्तु पवित्र,या,अपवित्र नहीं होती
अगर कुछ प्रभावित होता है तो हमारा मन जो कण से बाहर है,और कण कण को पवित्र अथवा अपवित्र ,रुप में देखने को परेशान रहता है।
मन को अघोर रुप देकर देखे,संसार में कुछ बुरा नहीं दिखेगा
Thursday, January 22, 2015
मन को अघोर रुप देवें
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Sohsarai, Sohsarai
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