छोड़ो कल की बॉतें,कल की बात पुरानी,
नये, दौर पर ,लिक्खेंगें मीलकर नयी कहानी !!
इन पंक्तियों में गीतकार का कितना सटीक संदेश है,जीवन के राह को आसान बनाने का।
अगर हमारे अंदर कल की बातों को छोड़ने का आदत पड़ जाये तो बहुत सी समस्याओं का सामाधान इतनी आसानी से हो जायेगा जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
विचार कर देंखें तो पता चलेगा हर लड़ाई की शुरुआत ही कल की बातो से होती है।
शायद "कल" को इसीलिये, "भूत काल " का नाम दिया गया है,ये जिसे पकड़ लेता है छोड़ने का नाम ही नहीं लेता और अगर छोड़ता है ,तो चढ़ावा लेकर ।
हमारा यह "भूत" तरह तरह के रोगों को जन्म देकर,हमारी सामाजिक,राजनैतिक, एवं भौतिक सुखों की बलि लेता है,जीवन को तहस नहस कर देता है,
कल का दौड़ ,वह दौड़ था,जब हम लड़खड़ा कर चलना सीख रहे थे,हर कमी को दूर करने का रास्ता खोज रहे थे,बड़ों के साथ लिहाज के चलते संवादहिनता आ गयी थी,जानकारी के साधन सीमित थे,और सोचने का नजरिया संकिर्ण !!
लेकिन हम भाग्यशाली हैं,कि आज हमारे सामने ऐसी कोई समस्या नहीं है।
हॉ एक समस्या है, "हमारी बैचारिक संकिर्णता"जो हमारा जान छोड़ने को तैयार नहीं है।
कोई भी वाद समाज के लिये घातक है,
इसके जंजाल से बाहर निकल कर ही हम,समाज के लिये कुछ कर सकते हैं,
जाति ,पॉति,ऊॅच नीच,धर्म अधर्म से आगे बढ़कर हमें शांतिवाद ,और संतोषवाद को बढ़ावा देना होगा ताकि मानव जीवन का उद्देश्य पूरा हो सके।
मानव जीवन का उद्देश्य धन संचय कर अगली पीढ़ी को निकम्मा बनाना नहीं है,बल्कि एक ऐसे रास्ते का निर्माण करना है,जो आने वाली पीढियों को,उस जगह पर पहुॅचा सके जहॉ भयमुक्त जिन्दगी को जीया जा सके।
Monday, January 26, 2015
छोड़ो कल की बातें
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment