Friday, February 6, 2015

धीरज,धर्म

धीरज ,धरम,मित्र,अरु नारी
आपत काल परख इम चारी
तुलसीदास ने अपनी इस चौपाई में एक संदेश दिया था,कि
आपत्तिकाल मं इन चारों की पहचान हो जाती है,
आपत्तिकाल में आपका धीरज यानी संयम
आपका धर्म,यानी आपके समाज के प्रति,राष्ट्र के प्रति,आपका दायित्व
आपके सुसंगत,वा कुसंगत मित्र
तथा आपकी  पत्नि का स्वभाव
मेरा मानना है कि ,बाकी की दो चीजें,मित्र और नारी,ये बाहरी पर्यावरण से प्राप्त होते है
लेकिन आपतकाल में जो व्यक्ति, धीरज और धरम को बचाये रखता है,
उसके सामने काल को भी नतमस्तक हो जाना पड़ता है
जब ये जग जाहीर है,कि हस्ताक्षर,और स्वभाव नहीं बदलते हैं,तब मित्र और नारी को परखने की क्या आवश्यकता है
परखना है तो खुद को
और परखना भी क्या
बस एक सार्थक एवं धनात्मक सोच के साथ अपने धीरज और धरम को बनाये रखना है
धीरज और धर्म की प्रेरणा का स्रोत गीता है,जहॉ हमें कर्म करने,और फल की आशा न करने को बताया गया है,काम करते जाना, धीरज की पराकाष्टा है
और धर्म ?
धर्म वह नहीं है,जिसके लिये हम शशड़ते हैं,
बल्कि धर्म वह है, जिसे करने के लिये मानव योनि में जन्म मीला है।जिसे करने से साधारण लोग भागते हैं,और विशिष्ट लोग उसमें लगे रहते हैं।

No comments:

Post a Comment