Monday, February 9, 2015

मॉ के बिना कोई नहींं

प्रकृति का नियम है
मॉ के बिना ईस धरती पर
कोई योनी जन्म ले ही नहीं सकती
प्रत्येक पुत्र,अथवा पुत्री को अपनी मॉ प्यारी होती है
काश ईस बात को हम समझ सकते कि,दुसरे की मॉ की ईज्जत करने, उसका सम्मान करके हम उस व्यक्ति को भावनात्मक शांति प्रदान कर सकते हैां।
पुरुषों और स्त्रियों के मामले में अलग नजरीया है,एक ओर पुरुष अपनी पत्नि के मॉ को सम्मान देकर उसके प्यार को जीतना चाहता है,दुसरी ओर अगर वही पत्नि जब उसके मॉ की उपेक्षा करती है तो वह उसे समझाने से भी डरता है कि,कहीं वह नाराज होकर घर में अशांति न पैदा कर दे।
स्त्रियॉ ये भूल जाती हैं कि उन्हें अपने जीवन में हर रंग से गुजरना है,
हर वो दर्द जो दूसरे को दो रही है,
कल सूद ब्याज सहीत उसे खुद भी मीलने वाला है
हम क्षणीक दु:ख,और क्षणीक गलतव्यवहारों के चलते,अपने पुत्र और पुत्रियों में,बगावत के बीज बोने लगते हैं,जो कल को हमारे लिये घातक तो होते ही हैं,उन बच्चों की जिन्दगी को भी अशान्त बना देते हैं,
गल्ती गल्ति होती है,चाहे वह जानबूझकर की जाय अथवा अन्जाने में
दोनो गल्ती हृदय की गहराईयों को इस कदर बेचैन करती है,कि हम किसी से कह भी नहीं सकते
यही चुप्पी सीधे हृदय पर आघात करती है,और डाक्टर से लेकर घर वालों तक को परेशान करती है
इसलिये समय मीले या न मीले लेकिन हो सके तो किसी का दिल नहीं दुखाना
बीमारी का दर्द दूर करने की ढेरों दवाईयॉ हैें,लेकिन भावनात्मक चोट का कोई प्राथमीक उपचार भी नहीं हैं।

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